खलनायक मनमोहन

हिंदी सिनेमा के एक ऐसे एक्टर थे जो खलनायक की भूमिका के लिए जाने जाते थे.
🎂28 जनवरी 1933 जमशेदपुर में
⚰️26 अगस्त 1979
मनमोहन का निधन हो गया था. जब तक रहे शान की जिंदगी जिए।
मनमोहन ने हिंदी के अलावा बंगाली, गुजराती और पंजाबी फिल्मों में भी काम किया
शंकर-जयकिशन के करीबी माने जाने वाले मनमोहन ने बतौर खलनायक फिल्म इंडस्ट्री में ऐसा सिक्का जमाया था कि एक ही महीने में 14 फिल्में प्रदर्शित हुई थीं. कभी किसी को काम के लिए मना नहीं करने वाले मनमोहन को यारों का यार माना जाता था. बॉलीवुड के पहले सुपरस्टार राजेश खन्ना, धर्मेंद्र, संजीव कुमार, जितेंद्र, सुजीत कुमार के करीबी दोस्त मनमोहन ने अपनी दोस्ती की वजह से ही विनोद खन्ना की फिल्मों में एंट्री करवाई थी.
सिनेमा में जितनी जरूरत एक हीरो की होती है, उतनी ही जरूरत एक विलेन की भी होती है या यूं कहें कि बिना विलेन के हीरो का क्या काम इसलिए इंडस्ट्री में जितना मान-सम्मान हीरो ने कमाया है उतना ही विलेन ने भी कमाया है। इंडस्ट्री ने भी एक से बढ़कर एक विलेन दिए हैं। विलेन की लिस्ट में ऐसे कई नाम हैं जिन्होंने काफी नाम और शोहरत कमाई है। इसी लिस्ट में शुमार हैं एक्टर मनमोहन।
मनमोहन ने बतौर खलनायक फिल्म इंडस्ट्री में ऐसा सिक्का जमाया था कि एक ही महीने में एक या दो नहीं बल्कि पूरी 14 फिल्में रिलीज हुई थीं। दरअसल उनके बारे में कहा जाता है कि वे कभी किसी को काम के लिए मना नहीं कर पाते थे। उनके करीबी बताते थे कि उन्हें बचपन से ही एक्टिंग का बड़ा शौक था। मनमोहन के भतीजे विनय ने एक बार मीडिया को बताया था कि ‘जमशेदपुर में साकची के आम बागान में उस दौर के मशहूर कॉमेडी एक्टर मुकरी, टुनटुन का एक प्रोग्राम होना था। वहां एक होटल में ये टीम ठहरी हुई थी।
इसकी जानकारी जब मनमोहन को मिली तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। एक्टिंग के शौकीन मनमोहन होटल पहुंच गए और इन मशहूर कलाकारों की खूब खातिरदारी की। मनमोहन के इस एक्ट से सभी लोग इतना खुश हो गए थे कि अपने साथ ही मुंबई लेकर चले गए। फिर क्या था मनमोहन ने ‘शहीद’, ‘जानवर’, ‘गुमनाम’, ‘अराधना’, ‘हमजोली’, ‘क्रांति’, ‘अमर प्रेम’ जैसी फिल्मों में शानदार अदाकारी का जबरदस्त सिक्का जमाया लिया था।

ब्राह्मण वंश

ब्राह्मण वंशावली (गोत्र प्रवर परिचय)
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सरयूपारीण ब्राह्मण या सरवरिया ब्राह्मण या सरयूपारी ब्राह्मण सरयू नदी के पूर्वी तरफ बसे हुए ब्राह्मणों को कहा जाता है। यह कान्यकुब्ज ब्राह्मणो कि शाखा है। श्रीराम ने लंका विजय के बाद कान्यकुब्ज ब्राह्मणों से यज्ञ करवाकर उन्हे सरयु पार स्थापित किया था। सरयु नदी को सरवार भी कहते थे। ईसी से ये ब्राह्मण सरयुपारी ब्राह्मण कहलाते हैं। सरयुपारी ब्राह्मण पूर्वी उत्तरप्रदेश, उत्तरी मध्यप्रदेश, बिहार छत्तीसगढ़ और झारखण्ड में भी होते हैं। मुख्य सरवार क्षेत्र पश्चिम मे उत्तर प्रदेश राज्य के अयोध्या शहर से लेकर पुर्व मे बिहार के छपरा तक तथा उत्तर मे सौनौली से लेकर दक्षिण मे मध्यप्रदेश के रींवा शहर तक है। काशी, प्रयाग, रीवा, बस्ती, गोरखपुर, अयोध्या, छपरा इत्यादि नगर सरवार भूखण्ड में हैं।
एक अन्य मत के अनुसार श्री राम ने कान्यकुब्जो को सरयु पार नहीं बसाया था बल्कि रावण जो की ब्राह्मण थे उनकी हत्या करने पर ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्त होने के लिए जब श्री राम ने भोजन ओर दान के लिए ब्राह्मणों को आमंत्रित किया तो जो ब्राह्मण स्नान करने के बहाने से सरयू नदी पार करके उस पार चले गए ओर भोजन तथा दान समंग्री ग्रहण नहीं की वे ब्राह्मण सरयुपारीन ब्राह्मण कहे गए।
सरयूपारीण ब्राहमणों के मुख्य गाँव :
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गर्ग (शुक्ल- वंश)
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गर्ग ऋषि के तेरह लडके बताये जाते है जिन्हें गर्ग गोत्रीय, पंच प्रवरीय, शुक्ल बंशज कहा जाता है जो तेरह गांवों में बिभक्त हों गये थे| गांवों के नाम कुछ इस प्रकार है|
(१) मामखोर (२) खखाइज खोर (३) भेंडी (४) बकरूआं (५) अकोलियाँ (६) भरवलियाँ (७) कनइल (८) मोढीफेकरा (९) मल्हीयन (१०) महसों (११) महुलियार (१२) बुद्धहट (१३) इसमे चार गाँव का नाम आता है लखनौरा, मुंजीयड, भांदी, और नौवागाँव| ये सारे गाँव लगभग गोरखपुर, देवरियां और बस्ती में आज भी पाए जाते हैं।
उपगर्ग (शुक्ल-वंश):
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उपगर्ग के छ: गाँव जो गर्ग ऋषि के अनुकरणीय थे कुछ इस प्रकार से हैं|
(१)बरवां (२) चांदां (३) पिछौरां (४) कड़जहीं (५) सेदापार (६) दिक्षापार
यही मूलत: गाँव है जहाँ से शुक्ल बंश का उदय माना जाता है यहीं से लोग अन्यत्र भी जाकर शुक्ल बंश का उत्थान कर रहें हैं यें सभी सरयूपारीण ब्राह्मण हैं।
गौतम (मिश्र-वंश):
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गौतम ऋषि के छ: पुत्र बताये जातें हैं जो इन छ: गांवों के वाशी थे|
(१) चंचाई (२) मधुबनी (३) चंपा (४) चंपारण (५) विडरा (६) भटीयारी
इन्ही छ: गांवों से गौतम गोत्रीय, त्रिप्रवरीय मिश्र वंश का उदय हुआ है, यहीं से अन्यत्र भी पलायन हुआ है ये सभी सरयूपारीण ब्राह्मण हैं।
उप गौतम (मिश्र-वंश):
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उप गौतम यानि गौतम के अनुकारक छ: गाँव इस प्रकार से हैं|
(१) कालीडीहा (२) बहुडीह (३) वालेडीहा (४) भभयां (५) पतनाड़े (६) कपीसा
इन गांवों से उप गौतम की उत्पत्ति मानी जाति है।
वत्स गोत्र (मिश्र- वंश):
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वत्स ऋषि के नौ पुत्र माने जाते हैं जो इन नौ गांवों में निवास करते थे|
(१) गाना (२) पयासी (३) हरियैया (४) नगहरा (५) अघइला (६) सेखुई (७) पीडहरा (८) राढ़ी (९) मकहडा
बताया जाता है की इनके वहा पांति का प्रचलन था अतएव इनको तीन के समकक्ष माना जाता है।
कौशिक गोत्र (मिश्र-वंश):
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तीन गांवों से इनकी उत्पत्ति बताई जाती है जो निम्न है।
(१) धर्मपुरा (२) सोगावरी (३) देशी
वशिष्ठ गोत्र (मिश्र-वंश):
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इनका निवास भी इन तीन गांवों में बताई जाती है।
(१) बट्टूपुर मार्जनी (२) बढ़निया (३) खउसी
शांडिल्य गोत्र ( तिवारी,त्रिपाठी वंश)
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शांडिल्य ऋषि के बारह पुत्र बताये जाते हैं जो इन बाह गांवों से प्रभुत्व रखते हैं।
(१) सांडी (२) सोहगौरा (३) संरयाँ (४) श्रीजन (५) धतूरा (६) भगराइच (७) बलूआ (८) हरदी (९) झूडीयाँ (१०) उनवलियाँ (११) लोनापार (१२) कटियारी, लोनापार में लोनाखार, कानापार, छपरा भी समाहित है।
इन्ही बारह गांवों से आज चारों तरफ इनका विकास हुआ है, यें सरयूपारीण ब्राह्मण हैं। इनका गोत्र श्री मुख शांडिल्य त्रि प्रवर है, श्री मुख शांडिल्य में घरानों का प्रचलन है जिसमे राम घराना, कृष्ण घराना, नाथ घराना, मणी घराना है, इन चारों का उदय, सोहगौरा गोरखपुर से है जहाँ आज भी इन चारों का अस्तित्व कायम है।
उप शांडिल्य ( तिवारी- त्रिपाठी, वंश):
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इनके छ: गाँव बताये जाते हैं जी निम्नवत हैं।
(१) शीशवाँ (२) चौरीहाँ (३) चनरवटा (४) जोजिया (५) ढकरा (६) क़जरवटा
भार्गव गोत्र (तिवारी या त्रिपाठी वंश):
भार्गव ऋषि के चार पुत्र बताये जाते हैं जिसमें चार गांवों का उल्लेख मिलता है|
(१) सिंघनजोड़ी (२) सोताचक (३) चेतियाँ (४) मदनपुर।
भारद्वाज गोत्र (दुबे वंश):
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भारद्वाज ऋषि के चार पुत्र बाये जाते हैं जिनकी उत्पत्ति इन चार गांवों से बताई जाती है|
(१) बड़गईयाँ (२) सरार (३) परहूँआ (४) गरयापार
कन्चनियाँ और लाठीयारी इन दो गांवों में दुबे घराना बताया जाता है जो वास्तव में गौतम मिश्र हैं लेकिन इनके पिता क्रमश: उठातमनी और शंखमनी गौतम मिश्र थे परन्तु वासी (बस्ती) के राजा बोधमल ने एक पोखरा खुदवाया जिसमे लट्ठा न चल पाया, राजा के कहने पर दोनों भाई मिल कर लट्ठे को चलाया जिसमे एक ने लट्ठे सोने वाला भाग पकड़ा तो दुसरें ने लाठी वाला भाग पकड़ा जिसमे कन्चनियाँ व लाठियारी का नाम पड़ा, दुबे की गादी होने से ये लोग दुबे कहलाने लगें। सरार के दुबे के वहां पांति का प्रचलन रहा है अतएव इनको तीन के समकक्ष माना जाता है।
सावरण गोत्र ( पाण्डेय वंश)
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सावरण ऋषि के तीन पुत्र बताये जाते हैं इनके वहां भी पांति का प्रचलन रहा है जिन्हें तीन के समकक्ष माना जाता है जिनके तीन गाँव निम्न हैं|
(१) इन्द्रपुर (२) दिलीपपुर (३) रकहट (चमरूपट्टी)
सांकेत गोत्र (मलांव के पाण्डेय वंश)
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सांकेत ऋषि के तीन पुत्र इन तीन गांवों से सम्बन्धित बाते जाते हैं|
(१) मलांव (२) नचइयाँ (३) चकसनियाँ
कश्यप गोत्र (त्रिफला के पाण्डेय वंश)
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इन तीन गांवों से बताये जाते हैं।
(१) त्रिफला (२) मढ़रियाँ (३) ढडमढीयाँ
ओझा वंश
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इन तीन गांवों से बताये जाते हैं।
(१) करइली (२) खैरी (३) निपनियां
चौबे -चतुर्वेदी, वंश (कश्यप गोत्र)
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इनके लिए तीन गांवों का उल्लेख मिलता है।
(१) वंदनडीह (२) बलूआ (३) बेलउजां
एक गाँव कुसहाँ का उल्लेख बताते है जो शायद उपाध्याय वंश का मालूम पड़ता है।
ब्राह्मणों की वंशावली
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भविष्य पुराण के अनुसार ब्राह्मणों का इतिहास है की प्राचीन काल में महर्षि कश्यप के पुत्र कण्वय की आर्यावनी नाम की देव कन्या पत्नी हुई। ब्रम्हा की आज्ञा से दोनों कुरुक्षेत्र वासनी
सरस्वती नदी के तट पर गये और कण् व चतुर्वेदमय सूक्तों में सरस्वती देवी की स्तुति करने लगे एक वर्ष बीत जाने पर वह देवी प्रसन्न हो वहां आयीं और ब्राम्हणो की समृद्धि के लिये उन्हें
वरदान दिया। वर के प्रभाव कण्वय के आर्य बुद्धिवाले दस पुत्र हुए जिनका क्रमानुसार नाम था👉
उपाध्याय,
दीक्षित,
पाठक,
शुक्ला,
मिश्रा,
अग्निहोत्री,
दुबे,
तिवारी,
पाण्डेय,
और
चतुर्वेदी।
इन लोगो का जैसा नाम था वैसा ही गुण। इन लोगो ने नत मस्तक हो सरस्वती देवी को प्रसन्न किया। बारह वर्ष की अवस्था वाले उन लोगो को भक्तवत्सला शारदा देवी ने अपनी कन्याए प्रदान की।
वे क्रमशः
उपाध्यायी,
दीक्षिता,
पाठकी,
शुक्लिका,
मिश्राणी,
अग्निहोत्रिधी,
द्विवेदिनी,
तिवेदिनी
पाण्ड्यायनी,
और
चतुर्वेदिनी कहलायीं।
फिर उन कन्याआं के भी अपने-अपने पति से सोलह-सोलह पुत्र हुए हैं वे सब गोत्रकार हुए जिनका नाम –
कष्यप,
भरद्वाज,
विश्वामित्र,
गौतम,
जमदग्रि,
वसिष्ठ,
वत्स,
गौतम,
पराशर,
गर्ग,
अत्रि,
भृगडत्र,
अंगिरा,
श्रंगी,
कात्याय,
और
याज्ञवल्क्य।
इन नामो से सोलह-सोलह पुत्र जाने जाते हैं।
मुख्य 10 प्रकार ब्राम्हणों ये हैं-
(1) तैलंगा,
(2) महार्राष्ट्रा,
(3) गुर्जर,
(4) द्रविड,
(5) कर्णटिका,
यह पांच “द्रविण” कहे जाते हैं, ये विन्ध्यांचल के दक्षिण में पाय जाते हैं। तथा विंध्यांचल के उत्तर मं पाये जाने वाले या वास करने वाले ब्राम्हण
(1) सारस्वत,
(2) कान्यकुब्ज,
(3) गौड़,
(4) मैथिल,
(5) उत्कलये,
उत्तर के पंच गौड़ कहे जाते हैं। वैसे ब्राम्हण अनेक हैं जिनका वर्णन आगे लिखा है।
ऐसी संख्या मुख्य 115 की है। शाखा भेद अनेक हैं । इनके अलावा संकर जाति ब्राम्हण अनेक है।
यहां मिली जुली उत्तर व दक्षिण के ब्राम्हणों की नामावली 115 की दे रहा हूं। जो एक से दो और 2 से 5 और 5 से 10 और 10 से 84 भेद हुए हैं,
फिर उत्तर व दक्षिण के ब्राम्हण की संख्या शाखा भेद से 230 के लगभग है। तथा और भी शाखा भेद हुए हैं, जो लगभग 300 के करीब ब्राम्हण भेदों की संख्या का लेखा पाया गया है। उत्तर व दक्षिणी ब्राम्हणां के भेद इस प्रकार है 81 ब्राम्हाणां की 31 शाखा कुल 115 ब्राम्हण संख्या, मुख्य है –
(1) गौड़ ब्राम्हण,
(2)गुजरगौड़ ब्राम्हण (मारवाड,मालवा)
(3) श्री गौड़ ब्राम्हण,
(4) गंगापुत्र गौडत्र ब्राम्हण,
(5) हरियाणा गौड़ ब्राम्हण,
(6) वशिष्ठ गौड़ ब्राम्हण,
(7) शोरथ गौड ब्राम्हण,
(😎 दालभ्य गौड़ ब्राम्हण,
(9) सुखसेन गौड़ ब्राम्हण,
(10) भटनागर गौड़ ब्राम्हण,
(11) सूरजध्वज गौड ब्राम्हण(षोभर),
(12) मथुरा के चौबे ब्राम्हण,
(13) वाल्मीकि ब्राम्हण,
(14) रायकवाल ब्राम्हण,
(15) गोमित्र ब्राम्हण,
(16) दायमा ब्राम्हण,
(17) सारस्वत ब्राम्हण,
(18) मैथल ब्राम्हण,
(19) कान्यकुब्ज ब्राम्हण,
(20) उत्कल ब्राम्हण,
(21) सरवरिया ब्राम्हण,
(22) पराशर ब्राम्हण,
(23) सनोडिया या सनाड्य,
(24)मित्र गौड़ ब्राम्हण,
(25) कपिल ब्राम्हण,
(26) तलाजिये ब्राम्हण,
(27) खेटुवे ब्राम्हण,
(28) नारदी ब्राम्हण,
(29) चन्द्रसर ब्राम्हण,
(30)वलादरे ब्राम्हण,
(31) गयावाल ब्राम्हण,
(32) ओडये ब्राम्हण,
(33) आभीर ब्राम्हण,
(34) पल्लीवास ब्राम्हण,
(35) लेटवास ब्राम्हण,
(36) सोमपुरा ब्राम्हण,
(37) काबोद सिद्धि ब्राम्हण,
(38) नदोर्या ब्राम्हण,
(39) भारती ब्राम्हण,
(40) पुश्करर्णी ब्राम्हण,
(41) गरुड़ गलिया ब्राम्हण,
(42) भार्गव ब्राम्हण,
(43) नार्मदीय ब्राम्हण,
(44) नन्दवाण ब्राम्हण,
(45) मैत्रयणी ब्राम्हण,
(46) अभिल्ल ब्राम्हण,
(47) मध्यान्दिनीय ब्राम्हण,
(48) टोलक ब्राम्हण,
(49) श्रीमाली ब्राम्हण,
(50) पोरवाल बनिये ब्राम्हण,
(51) श्रीमाली वैष्य ब्राम्हण
(52) तांगड़ ब्राम्हण,
(53) सिंध ब्राम्हण,
(54) त्रिवेदी म्होड ब्राम्हण,
(55) इग्यर्शण ब्राम्हण,
(56) धनोजा म्होड ब्राम्हण,
(57) गौभुज ब्राम्हण,
(58) अट्टालजर ब्राम्हण,
(59) मधुकर ब्राम्हण,
(60) मंडलपुरवासी ब्राम्हण,
(61) खड़ायते ब्राम्हण,
(62) बाजरखेड़ा वाल ब्राम्हण,
(63) भीतरखेड़ा वाल ब्राम्हण,
(64) लाढवनिये ब्राम्हण,
(65) झारोला ब्राम्हण,
(66) अंतरदेवी ब्राम्हण,
(67) गालव ब्राम्हण,
(68) गिरनारे ब्राम्हण
ब्राह्मण गौत्र और गौत्र कारक 115 ऋषि
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(1). अत्रि, (2). भृगु, (3). आंगिरस, (4). मुद्गल, (5). पातंजलि, (6). कौशिक,(7). मरीच, (😎. च्यवन, (9). पुलह, (10). आष्टिषेण, (11). उत्पत्ति शाखा, (12). गौतम गोत्र,(13). वशिष्ठ और संतान (13.1). पर वशिष्ठ, (13.2). अपर वशिष्ठ, (13.3). उत्तर वशिष्ठ, (13.4). पूर्व वशिष्ठ, (13.5). दिवा वशिष्ठ, (14). वात्स्यायन,(15). बुधायन, (16). माध्यन्दिनी, (17). अज, (18). वामदेव, (19). शांकृत्य, (20). आप्लवान, (21). सौकालीन, (22). सोपायन, (23). गर्ग, (24). सोपर्णि, (25). शाखा, (26). मैत्रेय, (27). पराशर, (28). अंगिरा, (29). क्रतु, (30. अधमर्षण, (31). बुधायन, (32). आष्टायन कौशिक, (33). अग्निवेष भारद्वाज, (34). कौण्डिन्य, (34). मित्रवरुण,(36). कपिल, (37). शक्ति, (38). पौलस्त्य, (39). दक्ष, (40). सांख्यायन कौशिक, (41). जमदग्नि, (42). कृष्णात्रेय, (43). भार्गव, (44). हारीत, (45). धनञ्जय, (46). पाराशर, (47). आत्रेय, (48). पुलस्त्य, (49). भारद्वाज, (50). कुत्स, (51). शांडिल्य, (52). भरद्वाज, (53). कौत्स, (54). कर्दम, (55). पाणिनि गोत्र, (56). वत्स, (57). विश्वामित्र, (58). अगस्त्य, (59). कुश, (60). जमदग्नि कौशिक, (61). कुशिक, (62). देवराज गोत्र, (63). धृत कौशिक गोत्र, (64). किंडव गोत्र, (65). कर्ण, (66). जातुकर्ण, (67). काश्यप, (68). गोभिल, (69). कश्यप, (70). सुनक, (71). शाखाएं, (72). कल्पिष, (73). मनु, (74). माण्डब्य, (75). अम्बरीष, (76). उपलभ्य, (77). व्याघ्रपाद, (78). जावाल, (79). धौम्य, (80). यागवल्क्य, (81). और्व, (82). दृढ़, (83). उद्वाह, (84). रोहित, (85). सुपर्ण, (86). गालिब, (87). वशिष्ठ, (88). मार्कण्डेय, (89). अनावृक, (90). आपस्तम्ब, (91). उत्पत्ति शाखा, (92). यास्क, (93). वीतहब्य, (94). वासुकि, (95). दालभ्य, (96). आयास्य, (97). लौंगाक्षि, (98). चित्र, (99). विष्णु, (100). शौनक, (101).पंचशाखा, (102).सावर्णि, (103).कात्यायन, (104).कंचन, (105).अलम्पायन, (106).अव्यय, (107).विल्च, (108). शांकल्य, (109). उद्दालक, (110). जैमिनी, (111). उपमन्यु, (112). उतथ्य, (113). आसुरि, (114). अनूप और (110). आश्वलायन।
कुल संख्या 108 ही हैं, लेकिन इनकी छोटी-छोटी 7 शाखा और हुई हैं। इस प्रकार कुल मिलाकर इनकी पूरी सँख्या 115 है।
ब्राह्मण कुल परम्परा के 11 कारक
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(1) गोत्र👉 व्यक्ति की वंश-परम्परा जहाँ और से प्रारम्भ होती है, उस वंश का गोत्र भी वहीं से प्रचलित होता गया है। इन गोत्रों के मूल ऋषि :– विश्वामित्र, जमदग्नि, भारद्वाज, गौतम, अत्रि, वशिष्ठ, कश्यप। इन सप्तऋषियों और आठवें ऋषि अगस्त्य की संतान गोत्र कहलाती है। यानी जिस व्यक्ति का गौत्र भारद्वाज है, उसके पूर्वज ऋषि भरद्वाज थे और वह व्यक्ति इस ऋषि का वंशज है।
(2) प्रवर👉 अपनी कुल परम्परा के पूर्वजों एवं महान ऋषियों को प्रवर कहते हैं। अपने कर्मो द्वारा ऋषिकुल में प्राप्‍त की गई श्रेष्‍ठता के अनुसार उन गोत्र प्रवर्तक मूल ऋषि के बाद होने वाले व्यक्ति, जो महान हो गए, वे उस गोत्र के प्रवर कहलाते हें। इसका अर्थ है कि कुल परम्परा में गोत्रप्रवर्त्तक मूल ऋषि के अनन्तर अन्य ऋषि भी विशेष महान हुए थे।
(3) वेद👉 वेदों का साक्षात्कार ऋषियों ने लाभ किया है। इनको सुनकर कंठस्थ किया जाता है। इन वेदों के उपदेशक गोत्रकार ऋषियों के जिस भाग का अध्ययन, अध्यापन, प्रचार प्रसार, आदि किया, उसकी रक्षा का भार उसकी संतान पर पड़ता गया, इससे उनके पूर्व पुरूष जिस वेद ज्ञाता थे, तदनुसार वेदाभ्‍यासी कहलाते हैं। प्रत्येक का अपना एक विशिष्ट वेद होता है, जिसे वह अध्ययन-अध्यापन करता है। इस परम्परा के अन्तर्गत जातक, चतुर्वेदी, त्रिवेदी, द्विवेदी आदि कहलाते हैं।
(4) उपवेद👉 प्रत्येक वेद से सम्बद्ध विशिष्ट उपवेद का भी ज्ञान होना चाहिये।
(5) शाखा👉 वेदों के विस्तार के साथ ऋषियों ने प्रत्येक एक गोत्र के लिए एक वेद के अध्ययन की परंपरा डाली है। कालान्तर में जब एक व्यक्ति उसके गोत्र के लिए निर्धारित वेद पढने में असमर्थ हो जाता था, तो ऋषियों ने वैदिक परम्परा को जीवित रखने के लिए शाखाओं का निर्माण किया। इस प्रकार से प्रत्येक गोत्र के लिए अपने वेद की उस शाखा का पूर्ण अध्ययन करना आवश्यक कर दिया। इस प्रकार से उन्‍होंने जिसका अध्‍ययन किया, वह उस वेद की शाखा के नाम से पहचाना गया।
6) सूत्र👉 प्रत्येक वेद के अपने 2 प्रकार के सूत्र हैं। श्रौत सूत्र और ग्राह्य सूत्र यथा शुक्ल यजुर्वेद का कात्यायन श्रौत सूत्र और पारस्कर ग्राह्य सूत्र है।
(7) छन्द 👉 उक्तानुसार ही प्रत्येक ब्राह्मण को अपने परम्परा सम्मत छन्द का भी ज्ञान होना चाहिए।
(😎 शिखा👉 अपनी कुल परम्परा के अनुरूप शिखा-चुटिया को दक्षिणावर्त अथवा वामावार्त्त रूप से बाँधने की परम्परा शिखा कहलाती है।
(9)पाद👉 अपने-अपने गोत्रानुसार लोग अपना पाद प्रक्षालन करते हैं। ये भी अपनी एक पहचान बनाने के लिए ही, बनाया गया एक नियम है। अपने-अपने गोत्र के अनुसार ब्राह्मण लोग पहले अपना बायाँ पैर धोते, तो किसी गोत्र के लोग पहले अपना दायाँ पैर धोते, इसे ही पाद कहते हैं।
(10) देवता👉 प्रत्येक वेद या शाखा का पठन, पाठन करने वाले किसी विशेष देव की आराधना करते हैं, वही उनका कुल देवता यथा भगवान् विष्णु, भगवान् शिव, माँ दुर्गा, भगवान् सूर्य इत्यादि देवों में से कोई एक आराध्‍य देव हैं।
(11)द्वार👉 यज्ञ मण्डप में अध्वर्यु (यज्ञकर्त्ता) जिस दिशा अथवा द्वार से प्रवेश करता है अथवा जिस दिशा में बैठता है, वही उस गोत्र वालों की द्वार या दिशा कही जाती है।

सिख

राम मंदिर को लेकर पहली FIR अयोध्या में 30 नवम्बर 1858 को सिखों के विरूद्ध हुई, रिपोर्ट में लिखा है, निहंग सिख, बाबरी ढांचे में घुस गए हैं, राम नाम के साथ हवन कर रहे हैं।
आज सिक्ख पंथ को हिन्दू धर्म से अलग करके देखने वाले कट्टरपंथियों को जानना चाहिए कि राम मंदिर के लिए पहली FIR हिन्दुओं के विरूद्ध नहीं सिखों के विरूद्ध हुई, क्योंकि सिक्ख सनातन हिन्दू धर्म संस्कृति के अभिन्न अंग व धर्म रक्षक योद्धा हैं।…
🙏जय श्रीराम🙏

मुड़ार (जठेरे)

नारोवाल गेट पाकिस्तान
नारोवाल

देशपाकिस्तान प्रांत पंजाब का विभाजन गुजरांवाला ज़िला सियालकोट कोट से हुआ था।

सियालकोट सियालकोट ( पंजाबी , उर्दू : سيالكوٹ ) पंजाब, पाकिस्तान में स्थित एक शहर है । यह सियालकोट जिले की राजधानी है और पाकिस्तान का 13वां सबसे अधिक आबादी वाला शहर है । सियालकोट की सीमाएँ उत्तर पूर्व में जम्मू , दक्षिण-पूर्व में नरोवाल जिलों , दक्षिण-पश्चिम में गुजरांवाला और उत्तर-पश्चिम में गुजरात से जुड़ती हैं।

भंगी मिसल राज्य के सिख सरदारों ने सियालकोट पर अतिक्रमण कर लिया, और 1786 तक सियालकोट क्षेत्र पर पूर्ण नियंत्रण हासिल कर लिया, सियालकोट को सरदार जीवन सिंह, नाथा सिंह, साहिब सिंह के नियंत्रण में 4 क्वार्टरों में विभाजित किया गया था। और मोहर सिंह, जिन्होंने शहर के बिखरे हुए निवासियों को वापस शहर में आमंत्रित किया। 

1791 तक भंगी शासक पड़ोसी सुकरचकिया मिस्ल राज्य के साथ झगड़ों में उलझ गए, और अंततः शहर पर नियंत्रण खो बैठे। रणजीत सिंह के सिख साम्राज्य ने 1808 में सरदार जीवन सिंह से सियालकोट पर कब्जा कर लिया। सिख सेनाओं ने 1849 में अंग्रेजों के आने तक सियालकोट पर कब्जा कर लिया। गुजरां वाला से सियालकोट का विभाजन हुआ।सियालकोट संभवतः मद्र साम्राज्य सागला , सकला ( संस्कृत : सकला ), या सांगला ( प्राचीन यूनानी : Σάγγαλα ) की राजधानी है , जिसका उल्लेख प्राचीन भारत के संस्कृत महाकाव्य महाभारत में किया गया है, जो सागला के ग्रीक खातों के समान क्षेत्र पर कब्जा करता है। मद्र, राष्ट्र महाकाव्य महाभारत में पश्चिमी राज्यों के बीच समूहीकृत एक राज्य था । इसकी राजधानी मद्रा क्षेत्र में सगला , पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में आधुनिक सियालकोट थी । कुरु राजा पांडु की दूसरी पत्नी मद्र साम्राज्य से थी और उन्हें माद्री कहा जाता था।क्या यहां के ब्राह्मण मुड़ार तो नही थे?

यह पोस्ट देखें… “हेड़ी लामर”.

हेडी लामार (अंग्रेज़ी: Hedy Lamarr, जन्म का पूरा नाम- Hedwig Eva Maria Kiesler, 

🎂जन्म- ⚰️09 नवंबर, 1914,
वियना, ऑस्ट्रिया; 

⚰️मृत्यु- 19 जनवरी, 2000, फ़्लोरिडा) एक खूबसूरत 

अभिनेत्री होने के साथ ही एक आविष्कारक भी थीं। आज जो वाई फ़ाई, ब्लुटूथ, सीडीएमए जैसी तकनीक का उपयोग किया जाता है, उसे बेहद खूबसूरत अभिनेत्री हेडी लामार ने खोजा था। उनकी 1933 में आई “स्टेसी” नाम की विवादास्पद फिल्म ने उन्हें रातों-रातों लोगों के दिलों में बैठा दिया था। हेडी लामार की यह दिवानगी लोगों में 1950 तक छाई रही।
परिचय
हेडी लामार का जन्म ऑस्ट्रिया में हुआ था। सिनेमा में उनका शानदार कॅरियर था और इससे ही उन्हें शोहरत मिली थी। वह हॉलिवुड का चमकता सितारा थीं। हेडी लामार ने छ: विवाह किये थे। जन्म के वक्त उनका नाम ‘हेडविग ईवा मारिया कीस्लर’ रखा गया था। वह एक रईस यहूदी परिवार में पैदा हुई थीं। उनका जन्म ऑस्ट्रिया के वियना में हुआ था। सबसे पहले उन्होंने एक हथियारों के डीलर उद्योगपति से शादी की थी। वह उनके तब शुरू ही हुए अभिनय के कॅरियर से खुश नहीं थे। उन्होंने उन्हें अपने दोस्तों और सहयोगियों के लिए मेजबान बनने का मौका दिया। उनके दोस्तों में कई नाज़ी भी शामिल थे।

हॉलिवुड में प्रवेश
हेडी लामार इस काम में टिक नहीं सकीं और गुपचुप तरीके से भागकर पहले पेरिस और फिर लंदन पहुंच गईं। यहां उनकी मुलाकात लीजेंडरी लुइस बी. मेयर से हुई, जो कि एमजीएम स्टूडियोज के प्रमुख थे। उन्होंने उन्हें हॉलिवुड में आने का ऑफर दिया और उन्हें दुनिया की सबसे खूबसूरत महिला के तौर पर प्रचारित किया। उन्होंने कई फ़िल्मों में काम किया और सफलता पाई।

अविष्कार
30 से अधिक फिल्मों के जरिए उनकी सफलता ने उन्हें मशहूर कर दिया था, लेकिन उन्हें असली ख्याति उनके आविष्कारक होने की वजह से मिली। हेडी लामार ने मित्र देशों के लिए एक गाइडेंस सिस्टम डिवेलप किया था। यह गाइडेंस सिस्टम टॉरपीडो के लिए था। फ्रीक्वेंसी को स्विच करने के जरिए दुश्मन उन टॉरपीडो को जाम न कर पाएं, इसके लिए उन्होंने इस गाइडेंस सिस्टम को ईजाद किया था। उनकी खोजों के तत्वों को आज के ब्लूटूथ और वाईफाई टेक्नोलॉजी में देखा जा सकता है।

हेडी लामार ने 1933 में अपनी पहली शादी के बाद अभिनय से कुछ दिनों के लिए विराम लिया और तकनीकी विज्ञान के क्षेत्र में कदम रखा। दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान उन्होंने मित्र राष्ट्रों के रेडियो को जाम करने को बड़ी समस्या माना और जार्ज एन्थल के साथ मिलकर स्पेक्ट्रम फैलाने की तकनीक खोजी। हालांकि इसका विश्वयुद्ध में इस्तेमाल नही हुआ, लेकिन बाद में इससे वाईफाई, ब्लूटूथ और सीडीएमए तकनीक का अविष्कार हुआ। उनके काम की सराहना के तौर पर 2014 में उन्हें “नेश्नल इन्वेटर हाल” में जगह मिली।

खलिस्तान ,पंजाबी सूबा।

indo-canadian mudar:
indo-canadian mudar:
खालसा स्टेट पंजाबी सूबा
पेप्सू से आता है। इसका मतलब है पटियाला और पूर्वी पंजाब राज्य संघ। यह अंग्रेजों के अधीन पंजाब प्रांत का एक हिस्सा था, जो 1948 से 1956 तक भारत का एक प्रांत रहा था। यह आठ जिलों पटियाला, जींद, नाभा, फरीदकोट, कलसिया, मलेरकोटला, कपूरथला और नालागढ़ से मिलकर बना था।
जो सिखों ने ही स्वीकार नही किया आज खालिस्तान मांगते है।
पंजाब को प्राचीन काल में  उत्तरापथ कहा जाता था.
1941 में अंतिम ब्रिटिश जनगणना में पंजाब में 34.3 मिलियन लोगों को दर्ज किया गया था, जिसमें ब्रिटिश क्षेत्र के भीतर 29 जिले, 43 रियासतें, 52,047 गांव और 283 कस्बे शामिल थे। 1881 में, केवल अमृतसर और लाहौर की जनसंख्या 100,000 से अधिक थी।
1952 में चंडीगढ़ पंजाब की राजधानी बना. इससे पहले शिमला भी पंजाब की राजधानी थी. वहीं पहले आजादी से पहले पंजाब की राजधानी लाहौर हुआ करती थी. 1947 में जब बंटवारा हुआ तो लाहौर पाकिस्तान में चला गया.
मास्टर तारा सिंह ने भी पैप्सू स्टेट को नही संभाला ना कोई आंदोलन में शामिल किया जबकि पटेल ने पेप्सू बनवा दिया था।
1950 में, दो अलग-अलग राज्य बनाए गए; पंजाब में पंजाब का पूर्व राज प्रांत शामिल था, जबकि पटियाला, नाभा, जिंद, कपूरथला, मालेरकोटला, फरीदकोट और कलसिया की रियासतों को एक नए राज्य, पटियाला और पूर्वी पंजाब राज्य संघ (पीईपीएसयू) में मिला दिया गया था।
इतिहास में आज भी लिखा हुआ मिलता है।
पंजाब’ शब्द का पहला ज्ञात दस्तावेज इब्न बतूता के लेखन में है, जिन्होंने चौदहवीं शताब्दी में इस क्षेत्र का दौरा किया था। यह शब्द सोलहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में व्यापक उपयोग में आया, और इसका उपयोग तारीख-ए-शेर शाह सूरी (1580) पुस्तक में किया गया था, जिसमें ‘पंजाब के शेर खान’ द्वारा एक किले के निर्माण का वर्णन किया गया है।
‘पंजाब’ का संदर्भ अबुल फज़ल द्वारा लिखित “आइन-ए-अकबरी” के खंड एक में भी पाया जा सकता है, जहां ‘पंजाब’ उस क्षेत्र का वर्णन करता है जिसे लाहौर और मुल्तान के प्रांतों में विभाजित किया जा सकता है। इसी प्रकार, आईन-ए-अकबरी के दूसरे खंड में, एक अध्याय के शीर्षक में ‘पंजनाद’ शब्द शामिल है।
हालाँकि, ‘पंजाब’ के संस्कृत समकक्ष का पहला उल्लेख महान महाकाव्य, महाभारत में मिलता है, जहाँ इसे पंच-नद के रूप में वर्णित किया गया है, जिसका अर्थ है ‘पाँच नदियों का देश’। मुगल राजा जहांगीर ने ‘तुज़क-ए-जंहागीरी’ में पंजाब शब्द का भी उल्लेख किया है, जो फ़ारसी से लिया गया है और भारत के तुर्क विजेताओं द्वारा पेश किया गया है, जिसका शाब्दिक अर्थ है “पांच” (पंज) “जल” (एबी), यानी, भूमि। पाँच नदियाँ, उन पाँच नदियों का जिक्र है जो इससे होकर गुजरती हैं। यही कारण था कि इसे ब्रिटिश भारत का अन्न भंडार बना दिया गया।
यह एक विशिष्ट संस्कृति के साथ दुनिया की सबसे प्राचीन सभ्यताओं में से एक है। पंजाबी भाषा की उत्पत्ति इंडो-यूरोपीय भाषा परिवार से हुई है जिसमें फ़ारसी और लैटिन शामिल हैं। जातीय और धार्मिक विविधता की भूमि, यह कई धार्मिक आंदोलनों का जन्मस्थान है। इनमें से कुछ प्रमुख में सिख धर्म, बौद्ध धर्म और इस्लाम के कई सूफी स्कूल शामिल हैं।
भारतीय राज्य पंजाब का निर्माण 1947 में हुआ था, जब भारत के विभाजन ने पंजाब के पूर्व राज प्रांत को भारत और पाकिस्तान के बीच विभाजित कर दिया था। प्रांत का अधिकांश मुस्लिम पश्चिमी भाग पाकिस्तान का पंजाब प्रांत बन गया; अधिकांश सिख पूर्वी भाग भारत का पंजाब राज्य बन गया। विभाजन के कारण कई लोग विस्थापित हुए और बहुत अधिक अंतरसांप्रदायिक हिंसा हुई, क्योंकि कई सिख और हिंदू पश्चिम में रहते थे, और कई मुस्लिम पूर्व में रहते थे। पटियाला सहित कई छोटी पंजाबी रियासतें भी भारतीय पंजाब का हिस्सा बन गईं।
1950 में, दो अलग-अलग राज्य बनाए गए; पंजाब में पंजाब का पूर्व राज प्रांत शामिल था, जबकि पटियाला, नाभा, जिंद, कपूरथला, मालेरकोटला, फरीदकोट और कलसिया की रियासतों को एक नए राज्य, पटियाला और पूर्वी पंजाब राज्य संघ (पीईपीएसयू) में मिला दिया गया था। हिमाचल प्रदेश को कई रियासतों और कांगड़ा जिले से एक केंद्र शासित प्रदेश के रूप में बनाया गया था।
1956 में, PEPSU को पंजाब राज्य में मिला दिया गया, और हिमालय में पंजाब के कई उत्तरी जिलों को हिमाचल प्रदेश में जोड़ दिया गया।
जब खालसा राज्य नही संभाल सके तब
पटियाला और पूर्वी पंजाब राज्य संघ ( PEPSU ) भारत का एक राज्य था , जिसने 1948 और 1956 के बीच आठ रियासतों को एकजुट किया था। राजधानी और प्रमुख शहर पटियाला था । राज्य का क्षेत्रफल 26,208 वर्ग किमी है। शिमला , कसौली , कंडाघाट और चैल भी PEPSU का हिस्सा बन गए।
PEPSU के पूर्व राज्य का एक हिस्सा, जिसमें वर्तमान जिंद जिला और उत्तरी हरियाणा में नारनौल तहसील के साथ-साथ लोहारू तहसील, चरखी दादरी जिला और दक्षिण-पश्चिम हरियाणा में महेंद्रगढ़ जिला शामिल है, वर्तमान में हरियाणा राज्य के भीतर स्थित है , जिसे अलग कर दिया गया था। 1 नवंबर 1966 को पंजाब से । कुछ अन्य क्षेत्र जो PEPSU के थे, विशेष रूप से सोलन और नालागढ़ , अब हिमाचल प्रदेश राज्य में स्थित हैं ।
अब खलिस्तान मागने वालो ध्यान से पढ़ें
प्रारंभ में, 1948 में, राज्य को निम्नलिखित आठ जिलों में विभाजित किया गया था:
पटियाला
नाभा
जींद
फरीदकोट
कलसियां
कपूरथला
मलेरकोटला
नालागढ़
1953 में जिलों की संख्या आठ से घटाकर पाँच कर दी गई। बरनाला जिला संगरूर जिले का हिस्सा बन गया और कोहिस्तान और फतेहगढ़ जिले पटियाला जिले का हिस्सा बन गए।
इस राज्य में चार लोकसभा क्षेत्र थे. उनमें से तीन एकल-सीट निर्वाचन क्षेत्र थे: मोहिंदरगढ़ , संगरूर और पटियाला । कपूरथला-भटिंडा लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र दोहरी सीटों वाला निर्वाचन क्षेत्र था।
इतना बड़ा राज्य जब नही संभाल सके तो इसके टुकड़े करवाने क्यों जरूरी थे?कोई नही बताता नियत में खोट नजर आता है सिखों पंजाबियों के प्रति कोई लगाव ना होना स्वार्थ के लिए खालिस्तान खालिस्तान चिल्लाना उचित नही। यह सब सिख लीडर शिप की कमजोरी ही दर्शाती घटनाएं इतिहास में दर्ज मिलती है
पंजाबी सूबा आन्दोलन पंजाब क्षेत्र में पंजाबी “सूबा” बनाने के लिये 1950 के दशक में शिरोमणि अकाली दल के नेतृत्व में चला था। इसके कारण पंजाबी बहुसंख्यक पंजाब, हरियाणवी बहुसंख्यक हरियाणा और पहाड़ी बहुसंख्यक हिमाचल प्रदेश की स्थापना हुई।
पंजाबी सुबा तो बहाना था मुख्य कारण हिंदू पंजाबी और सिख पंजाबी अलगाववाद लाना था इसमें पंजाबी भाषा कोई कारण नजर नही आता था क्यों की भारत में आज भी कुछ दूरी तय करने पर भाषा में बदलाव नजर आने लगता है।
आइए आज फिर उसी दौर की कुछ यादें याद करते है।
पंजाबी सूबा स्थापना दिवसः आजादी से पहले पंजाब के टुकड़े करने की मांग
1 नवंबर को पंजाबी सूबा और हरियाणा स्थापना दिवस होता है। पंजाबी सूबे के गठन और हरियाणा स्थापना दिवस को जानने से पहले इसके इतिहास को जानना जरूरी है। इतिहास के झरोखे से देखें तो विभाजन का दंश झेलने से पहले ही पंजाब को टुकड़ों में बांटने की मांग उठनी शुरू हो गई थी। तब की अखबारों की तरफ से जुटाए गए तथ्यों के आधार पर आपको अवगत करवाया जा रहा है कि कैसे पंजाब को देश से अलग करने और टुकड़ों में बांटने की सियासत तभी शुरू हुई थी।
पहला तथ्य
सन् 1930 में शायर मुहम्मद इक़बाल ने भारत के उत्तर-पश्चिमी चार प्रांतों सिंध, बलूचिस्तान, पंजाब तथा अफ़गान (सूबा-ए-सरहद)- को मिलाकर एक अलग राष्ट्र का मांग की थी। 1947 में देश को मिली आजादी के साथ ही पंजाब के भी दो टुकड़े हो गए। एक पूर्वी पंजाब और दूसरा पश्चिमी पंजाब। पश्चिमी पंजाब आज पाकिस्तान में है और यह पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत है। आज भी पाकिस्तान के 48% लोग पंजाबी भाषा समझते और बोलते हैं पर खलिस्तान समर्थक नही है वो नही कहते हमारे यहां खलिस्तान बने।
दूसरा तथ्य
हरियाणा को अलग राज्य बनाने की मांग भी पाकिस्तान में ही उठी थी। सबसे पहले यह मांग सन् 1923 में स्वामी सत्यानंद ने लाहौर (पाकिस्तान) में की थी। इसके बाद दीनबन्धु सर छोटूराम की अध्यक्षता में मेरठ में आल इंडिया स्टूडैंटस कांफ्रेस में हरियाणा को अलग राज्य बनाने की मांग उठी। सन् 1926 में दिल्ली में आल इंडिया मुस्लिम लीग की कांफ्रेंस में प्रस्ताव पारित किया गया कि पंजाब में हिंदी भाषीय क्षेत्र एवं अंबाला मंडल को पंजाब से हटाकर दिल्ली के साथ जोड़ देना चाहिए। हरियाणा क्षेत्र के अनेक नेताओं जैसे देशबंधु गुप्ता, पंडित नेकीराम शर्मा और पंडित श्रीराम शर्मा ने अलग हरियाणा राज्य के गठन के लिए प्रयास किए।
तीसरा तथ्य
सन् 1950 में भाषाई समूहों द्वारा राज्यत्व की मांग के परिणामस्वरूप दिसम्बर 1958 में राज्य पुनर्गठन आयोग बना। उस समय वर्तमान पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश के कुछ क्षेत्र तथा चंडीगढ़ पंजाब प्रदेश के हिस्से थे । सिखों का विशाल बहुमत इसी हिन्दु बहुल पंजाब में रहता था। उस समय शिरोमणि अकाली दल पंजाब में सक्रिय था। और अकाली द्वारा पंजाबी सूबे (प्रांत) बनाने की मांग की गई। सिख नेता फतेह सिंह ने भाषा को आधार बनाकर एक अलग राज्य की मांग की, ताकि सिखों की पहचान को संरक्षित किया जा सके।
अकाली दल के आन्दोलन
अकाली दल के नेताओं ने पंजाब और् पैप्सू के विलय के बाद भी एक “पंजाबी सूबे” के निर्माण के लिए अपने आंदोलन को जारी रखा। अकाल तख्त ने चुनाव प्रचार करने के लिए सिखों के आयोजन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पंजाबी सूबा आंदोलन के दौरान, 1955 में 12000 और 1960-61 में 26000 सिखों ने अपनी गिरफ्तारियां दीं।
सितम्बर 1966 में इंदिरा गांधी की सरकार ने सिखों की मांग को स्वीकार करते हुए पंजाब को पंजाब पुनर्गठन अधिनियम के अनुसार तीन भागों में बांट दिया।जब की आज भी भ्रम फैलाया जाता है कि सिखोकी सुनवाई नही होती हमारे साथ गुलामों जैसा व्यवहार होता है ।
जो समझ से परे है।
पेप्सू ना संभाल पाना गलती नही तो क्या है। जिस का नतीजा, पंजाब का दक्षिण भाग जहां हरियाणवी बोली जाती थी उसे अलग हरियाणा प्रदेश बना दिया गया।
जहां पहाड़ी बोली जाती थी, उस भाग को हिमाचल प्रदेश में मिला दिया गया। शेष क्षेत्रों, चंडीगढ़ को छोड़कर, एक नए पंजाबी बहुल राज्य का गठन किया गया। 1966 तक, पंजाब 68.7 प्रतिशत हिन्दुओं के साथ एक हिंदू बहुमत राज्य था लेकिन भाषाई विभाजन के दौरान, हिंदू बहुल जिलों राज्य से हटा दिया गया। चंडीगढ़, जिसे विभाजन के बाद राजधानी के रूप में प्रतिस्थापित किया गया, पर पंजाब और हरियाणा, दोनों ने अधिकार जताया। परिणामनुसार चंडीगढ़ को केंद्र शासित प्रदेश घोषित कर दिया गया जोकि दोनों राज्यों के लिये राजधानी की तरह होगा। आज भी कई सिख संगठनों का यह मानना है कि पंजाब का त्रि-विभाजन सही रूप से नहीं किया गया। क्योंकि विभाजन के बाद कई पंजाबी भाषी जिले हरियाणा में चले गये।
मुझे माइकल ब्रेचर का यह प्रत्यक्षदर्शी विवरण मिला।
“मैंने अब तक का सबसे प्रभावशाली और शांतिपूर्ण प्रदर्शन सबसे पहले सिखों द्वारा देखा है। घंटे दर घंटे और मील दर मील वे अमृतसर की मुख्य सड़क पर, जो 1919 की गोलीबारी के कारण भारतीय राष्ट्रवाद में एक पवित्र नाम था, आठ बराबर में मार्च करते रहे। बूढ़े और जवान, पुरुष और महिलाएं, वे एक अंतहीन धारा में आए, अधिकांश के साथ उनकी आँखों में एक अभिव्यक्ति और उदासी है, कई लोग अभी भी 1947 के भयानक दिनों को याद करते हैं जब उनकी मातृभूमि को दो हिस्सों में काट दिया गया था और सैकड़ों हजारों लोग मुसलमानों के सामने भाग गए थे, और जब उनके हजारों सह-धर्मवादी मारे गए थे या अपंग हो गए थे। उन बूढ़ों की शक्ल-सूरत में कितनी ताकत थी, जो अपनी बढ़ती हुई दाढ़ी के साथ पुराने ज़माने के इब्रानी भविष्यवक्ताओं की तरह दिखते थे! कई लोग अपनी पारंपरिक तलवार कृपाण लेकर आए और कई लोगों ने सिख उग्रवाद का प्रतीक नीली पगड़ी पहनी। वे पंजाब के गाँवों और कस्बों से और दूर-दूर से भी आये थे। लगभग बिना किसी अपवाद के उन्होंने अपने उद्देश्य की एकता को दर्शाते हुए एक व्यवस्थित फ़ाइल में मार्च किया। बीच-बीच में ‘पंजाबी सूबा जिंदाबाद’ (पंजाबी सूबा जिंदाबाद) और मास्टर तारा सिंह जिंदाबाद के नारे गूंजते रहे, साथ ही बीच-बीच में संगीत भी कार्यक्रम को जीवंत बनाता रहा। वे आये, पाँच घंटे के लिए। बहुत कम लोगों ने देखा कि उन्हें कट्टर हिंदू धर्म के दुष्ट आलिंगन में फंस जाने के अपने वास्तविक डर पर संदेह हो सकता है। रूढ़िवादी अनुमान के अनुसार उनकी संख्या 100,000 थी। इस पर्यवेक्षक को यह उस आंकड़े से दोगुना लग रहा था।
भारतीय पुलिस ने 1955 में पहली बार दरबार साहिब पर हमला किया, जूते पहनकर अंदर प्रवेश किया, सिखों को गिरफ्तार किया, गुरु ग्रंथ साहिब जी का अनादर किया। हिमाचल प्रदेश में गुरुद्वारा पांवटा साहिब पर हमला किया गया जहां गुरुद्वारे के अंदर 16 सिखों की गोली मारकर हत्या कर दी गई। क्या यह कुछ अलग है कि अंग्रेजों ने गुरुद्वारा रकाब गंज साहिब पर हमला किया?
पंजाबी सूबा बनने के बाद हिंदुओं को अपना गुस्सा निकालने के लिए पांच दिन का समय दिया गया। हरियाणा, हिमाचल, एमपी और अन्य स्थानों पर सिखों पर हमले किए गए। हिंदुओं ने नारे लगाए:
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मुगलों ने सिख बच्चों को मार डाला और आज की भारत सरकार भी इससे अलग नहीं है।
यह था आपसी भाईचारा जो अलगाव वादियों और खालिस्तानियों को आज पसंद नहीं वो जानबूझ कर नहीं हिंदुओ को ललकारने लगे जो नई हिंदू पीढ़ी को रास नहीं आ रहा और आपसी भाई चारे के माहोल को बिगाड़ ने का काम चलने लगा जिसका लाभ भारत की प्रगति से जलने वाली विदेशी ताकते उठा ने लगी।
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अमृता प्रीतम

अमृता प्रीतम
🎂जन्म: 31 अगस्त, 1919, पंजाब पाकिस्तान
⚰️ मृत्यु: 31 अक्टूबर, 2005 दिल्ली
पूरा नाम अमृता प्रीतम
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र साहित्य
मुख्य रचनाएँ ‘काग़ज़ ते कैनवास’ (ज्ञानपीठ पुरस्कार), ‘रसीदी टिकट’, ‘पिंजर’ आदि।
भाषा पंजाबी, हिन्दी
पुरस्कार-उपाधि ‘पद्म विभूषण’ (2004), ‘पद्मश्री’ (1969), ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार’ (1956), ‘ज्ञानपीठ पुरस्कार’ (1982)
प्रसिद्धि कवयित्री, उपन्यासकार, लेखिका
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी अमृता प्रीतम पहली महिला थीं, जिन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला और साथ ही साथ वे पहली पंजाबी महिला थीं, जिन्हें 1969 में पद्मश्री सम्मान से सम्मानित किया गया।
इन्हें भी देखें कवि सूची, साहित्यकार सूची
अमृता प्रीतम
🎂जन्म: 31 अगस्त, 1919, पंजाब पाकिस्तान
⚰️ मृत्यु: 31 अक्टूबर, 2005 दिल्ली प्रसिद्ध कवयित्री, उपन्यासकार और निबंधकार थीं, जिन्हें 20वीं सदी की पंजाबी भाषा की सर्वश्रेष्ठ कवयित्री माना जाता है। इनकी लोकप्रियता सीमा पार पाकिस्तान में भी बराबर है। इन्होंने पंजाबी जगत् में छ: दशकों तक राज किया। अमृता प्रीतम ने कुल मिलाकर लगभग 100 पुस्तकें लिखी हैं, जिनमें उनकी चर्चित आत्मकथा ‘रसीदी टिकट’ भी शामिल है। अमृता प्रीतम उन साहित्यकारों में थीं, जिनकी कृतियों का अनेक भाषाओं में अनुवाद हुआ। अपने अंतिम दिनों में अमृता प्रीतम को भारत का दूसरा सबसे बड़ा सम्मान ‘पद्म विभूषण’ भी प्राप्त हुआ। उन्हें ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार’ से पहले ही अलंकृत किया जा चुका था।
जीवन परिचय
अमृता प्रीतम का जन्म 1919 में गुजराँवाला (पंजाब- पाकिस्तान) में हुआ था। बचपन लाहौर में बीता और शिक्षा भी वहीं पर हुई। इन्होंने पंजाबी लेखन से शुरुआत की और किशोरावस्था से ही कविता, कहानी और निबंध लिखना शुरू किया। अमृता जी 11 साल की थी तभी इनकी माताजी का निधन हो गया, इसलिये घर की ज़िम्मेदारी भी इनके कंधों पर आ गयी। ये उन विरले साहित्यकारों में से है जिनका पहला संकलन 16 साल की आयु में प्रकाशित हुआ। फिर आया 1947 का विभाजन का दौर, इन्होंने विभाजन का दर्द सहा था, और इसे बहुत क़रीब से महसूस किया था, इनकी कई कहानियों में आप इस दर्द को स्वयं महसूस कर सकते हैं। विभाजन के समय इनका परिवार दिल्ली में आ बसा। अब इन्होंने पंजाबी के साथ-साथ हिन्दी में भी लिखना शुरू किया। इनका विवाह 16 साल की उम्र में ही एक संपादक से हुआ, ये रिश्ता बचपन में ही माँ-बाप ने तय कर दिया था। यह वैवाहिक जीवन भी 1960 में, तलाक के साथ टूट गया।
कृतियाँ
1960 में अपने पति से तलाक के बाद, इनकी रचनाओं में महिला पात्रों की पीड़ा और वैवाहिक जीवन के कटु अनुभवों का अहसास को महसूस किया जा सकता है। विभाजन की पीड़ा को लेकर इनके उपन्यास ‘पिंजर’ पर एक फ़िल्म भी बनी थी, जो अच्छी ख़ासी चर्चा में रही। इन्होंने लगभग 100 पुस्तकें लिखीं और इनकी काफ़ी रचनाएं विदेशी भाषाओं में भी अनूदित हुई हैं।
अमृता प्रीतम की रचनाएँ
कहानी संग्रह
सत्रह कहानियाँ
सात सौ बीस क़दम
10 प्रतिनिधि कहानियाँ
चूहे और आदमी में फ़र्क़
दो खिड़कियाँ
ये कहानियाँ जो कहानियाँ नहीं हैं
उपन्यास
कैली कामिनी और अनीता
यह कलम यह काग़ज़ यह अक्षर
ना राधा ना रुक्मणी
जलते बुझते लोग
जलावतन
पिंजर

चमार

भगवान जिस धर्म में जन्म देता है अगर उसी के धर्म को सही तरीके से जिया जाए इसी का जीता जागता प्रमाण है हिंदू चमार BATA

टोमस बाटा चमार
कहानी TATA की नही, ना ही किसी BIRLA या BAJAJ की. कहानी है BATA की, हर भारतीयों के लगता है BATA भारतीय कंपनी है. लेकिन कभी एहसास ही नही हुआ BATA विदेशी कंपनी है और इस भव्य कंपनी की स्थापना चमार जाति के TOMAS BATA ने 1894 में की थी.

◆◆◆
हैरान परेशान होने की जरूरत नही है. BATA परिवार चमार जाति से हैं. BATA परिवार 8 पीढ़ियों से जूते चप्पल और चमड़े बनाने के कारोबार से जुड़ा है. यानी BATA परिवार 300 वर्ष से महान और पवित्र कार्य चमड़ों के उत्पादन से जुड़े हैं.

TOMAS BATA का जन्म 1876 में CZECHOSLOVAKIA के एक छोटे शहर ZLIN में हुआ. पूरा परिवार मोची के कार्य से जुड़ा था. इस छोटे से शहर में BATA परिवार के अलावा बेहतरीन जूते चप्पल कोई नही बना सकता था. चमड़े के कार्य में BATA परिवार का मान सम्मान था.

CZECHOSLOVAKIA देश में चर्मकार को नीच या अछूत नही समझा जाता. उन्हें समाज में बराबरी का मान सम्मान था, बल्कि यूरोप अमेरिका में किसी भी श्रम उत्पादन कार्य जुड़े लोगों का पुजारी वर्ग से अधिक मान सम्मान है. घोड़ी पर चढ़ने और मूंछ रखने पर वहां हत्या नही होती.

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बराबरी के महान समाज में TOMAS BATA ने भी अपने परिवार का पेशा अपनाया और मोची बन गए. TOMAS बेहद सस्ते और अच्छे गुणवत्ता के जूते चप्पल बनाकर बेचते. बिक्री ज्यादा होती पर मुनाफा कम होता. TOMAS BATA ने जूते चप्पल निर्माण की कंपनी खोलनी चाहिए. कंपनी खोलने में आर्थिक सहायता का काम उनकी माँ ने किया और भाई बहन उनके सहयोगी बने.

अपने घर के एक कमरे में 1894 में BATA कंपनी की नींव डाली. अच्छे गुणवत्ता के जूते सस्ते दामों में बेचने के कारण TOMAS BATA को नुकसान हुआ. कंपनी चलाने का गुण सीखने के लिए लंदन में एक जूते की फैक्टरी में मजदूर बनकर काम किया.

मार्केटिंग, स्ट्रेटेजी, प्रोडक्शन, डिस्ट्रीब्यूशन और विज्ञापन का गुण सीखकर उन्होंने दुबारा अपने देश आकर BATA कंपनी में जान फूंक दी. अच्छे गुणवत्ता के जूते चप्पल सस्ते दामों में बेचना जारी रखा. ज्यादा सेल होने के कारण कंपनी को मुनाफा हुआ.

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उस वक़्त अच्छे गुणवत्ता के वस्तुओं का अर्थ था महंगे दामों में बिकने वाली वस्तु जो केवल अमीर आदमी खरीद सकते थे. चमार जाति के काबिल उद्योगपति TOMAS BATA ने इस धारणा को ध्वस्त कर नई धारणा गड़ी, अच्छे और बेहतरीन गुणवत्ता की वस्तुएं भी सस्ते दामों में मिल सकती है. और BATA के जूते चप्पल इनमें से एक थे.

आज से 100 साल पहले तक जूते हो या चप्पल इसे अमीरों की पहनने वाली वस्तु समझा जाता था. गरीब तो नंगे पांव ट्रैन में सफर कर बम्बई कलकत्ता में मजदूरी करने आते थे. TOMAS BATA का सपना है अमीर हो या गरीब BATA के जूते हर पैर में होने चाहिए. पूरे भारत में फैल कर कंपनी ने अफ्रीका में भी अपना विस्तार किया जहां कई कंपनियां जाने इसलिए कतराती थीं गरीब अफ्रीकी जिसके पास खाने को नही है वे जूते चप्पल कहां से खरीदेंगे ?

लेकिन TOMAS BATA ने अफ्रीका महाद्वीप के पूरे देश में सस्ते दामों में जूते चप्पल बेचकर हर गरीब के पांव में जूते चप्पल पहना दिया.

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1932 में TOMAS BATA की हवाई जहाज दुर्घटना में मृत्यु हो गई.उनके निधन के बाद उनके भाई और उनके पुत्र ने BATA कंपनी को हर देश में सबकी पसंदीदा कंपनी बना दिया.

BATA केवल जूते चप्पल का ब्रांड नही, भरोसे का भी ब्रांड है. चर्मकार TOMAS BATA ने कहा था मुनाफे के साथ वो उपभोक्ताओं का भरोसा भी कमाना चाहते हैं. BATA आज भी भरोसे का नाम है.

अंतिम पंक्ति : TOMAS BATA का जन्म अगर भारत में हुआ होता तो यहां भेदभाव करने वाला धर्म, जातीय वर्ण व्यवस्था वाला समाज TOMAS BATA को उद्योगपति नही केवल मोची बने रहने का अधिकार देता.

पंजाबी फिल्मों का गिरता सत्र

पोस्टर को देखे
“पिंड अमरीका”
क्या अमरीका पिंड गांव या अमरीका का गांव निर्माता ही निर्णय नही ले सकता अपने लक्ष को कि क्या दिखाए
 क्या विषय बनाए
ऐतिहासिक घटना या अमेरिका काल्पनिक उड़ान “उड़ दा पंजाब या उड़ दा पंजाबी संस्कार”
क्या अब अच्छे अभिनेताओं और अच्छी कहानियों की कमी नहीं है?
अब हमें सोचना और विचार करना होगा.?.पंजाबी गणित की पंजाबी फिल्में सफल क्यों नहीं हो रही हैं?
क्या पटकथा पर मेहनत नहीं हो रही?
2 क्या अनुभवहीन निर्देशक हैं?
क्या प्रोड्यूसर बिना समझे काम ले रहे हैं और आंखें बंद करके पैसे दे रहे हैं?
क्या फिल्म बनाने के बहाने कबूतरबाज़ी की जाती है?
क्या भारत के काले धन को सफेद करने का कोई तरीका है?
कहीं कोई समस्या तो जरूर है, जिस पर विचार करना जरूरी है?
हमें पता चला है कि पंजाबी फिल्म उद्योग में 80% जुआरी हैं, जो नहीं जानते कि वे क्या कर रहे हैं, न ही उनके पास कोई शिक्षा है, लेकिन वे चीजें बेच सकते हैं, हर बार उन्हें नए “एनआरआई निर्माता” मिल जाते हैं, जो फिल्में बनाते हैं। कोशिश करते हैं, अपनी जेबें भरते हैं, फिल्म फ्लॉप होने के बाद निर्माता फिल्मों से तौबा कर लेते हैं, और जुगरू लोग फिर नये निर्माता की तलाश में लग जाते हैं, बस यही क्रम लगातार चलता रहता है? इसलिए नहीं आ रही अच्छी फिल्में? यदि इससे नए निर्माताओं को मदद मिलती है तो आप यहां लिखकर अपना अनुभव हमारे साथ साझा कर सकते हैं..!!
केवल 20% लोग ही अनुभवी, मेहनती और अच्छा काम करने वाले हैं और केवल उन्हीं की फिल्में सफल हो रही हैं? पंजाबियत के बारे में सोचने के लिए कुछ किसी के पास कुछ नही..!!
जैसे पंजाबी पिंड को प्रवासी भारतीय बना रहे या समझ रहे है कनेडा,अमरीका,।
वहीं अपनी मिट्टी से जुड़े पंजाबी उसी पिंड को अमरीका , कनेडा नही नर्क गिन ने लगे है जैसे महत्त्व पूर्ण विषयों पर पंजाबी सिनेमा जगत की कोई रुचि ही नही लगती।
जिस पंजाब के भारत ने चंद्र यान , सूर्य यान बनाए उससे अच्छी कौनसी शिक्षा है जैसे प्राप्त करने को पूरा पंजाब ही अमेरिका कनेडा को भाग रहा है जैसे मुद्दों से भटक कर आज “पंजाबी फिल्मों” के सत्र को मुद्दे हीन फिल्मे बनानी ही क्यों पड़ रही है क्या पंजाब के “सामाजिक” मुद्दों पर फिल्मे बन ना बनद नही हो गई और अपने स्तर से नीचे की श्रेणी की फिल्मे हमे नही परोस रहा आज का “पंजाबी सिनेमा” अच्छे अभिनेताओं और अच्छी कहानियों की कमी नहीं है, अब हमें सोचना और विचार करना होगा.?.
की पंजाबी फिल्में सफल क्यों नहीं हो रही हैं?
कयों कि पटकथा पर मेहनत नहीं हो रही?
2 याअनुभवहीन निर्देशक हैं?
या फिर प्रोड्यूसर बिना समझे काम ले रहे हैं और आंखें बंद करके पैसे दे रहे हैं?
या फिर फिल्म बनाने के बहाने कबूतरबाज़ी की जाती है?
या फिर यह भारत के काले धन को सफेद करने का कोई तरीका है?
कहीं कोई समस्या है जरूर, जिस पर विचार करना बहुत जरूरी है?
हमें पता चला है कि पंजाबी फिल्म उद्योग में 80% जुआरी हैं, जो नहीं जानते कि वे क्या कर रहे हैं, न ही उनके पास कोई शिक्षा है, लेकिन वे चीजें बेच सकते हैं, हर बार उन्हें नए एनआरआई निर्माता मिल जाते हैं, जो फिल्में बनाते हैं। कोशिश करते हैं, अपनी जेबें भरते हैं, फिल्म फ्लॉप होने के बाद निर्माता फिल्मों से तौबा कर लेते हैं, जुगरू लोग फिर नये निर्माता की तलाश में लग जाते हैं, बस यही क्रम लगातार चलता आ रहता है? इसी लिए नहीं आ रही अच्छी फिल्में? यदि इस से किसी नए निर्माताओं को मदद मिलती है तो आप यहां लिखकर अपना अनुभव हमारे साथ साझा कर सकते हैं..!!
“उड़ता पंजाब” विषय मिल जाता है
परंतु नही मिलता की भारत जहां की पडाई पढ़े लोग चंद्र यान सूर्य यान बना विश्व में अपना अपने देश का नाम चमकाते हैं उसी देश का नौजवान पड़ाई के नाम पर अमरीका _कनेडा क्यों जारहा है यह तो कोई मुद्दा ही नही ऐसा पंजाबी फिल्म निर्माताओं को क्यों लगता है?
भारतीय प्रवासियों को पंजाब अमरीका कनेडा क्यों लगता है?
भी कोई मुद्दा नहीं नजर आता जिन पर कोई पंजाबी फिल्म ना बन ना पंजाबी फिल्मों के गिरते ग्राफ को स्पष्ट करती है। हो सकता है आप भी ऐसे कटु सत्य का साथ ना देना चाहे!!
केवल 20% लोग ही अनुभवी, मेहनती और अच्छा काम करने वाले हैं और केवल उन्हीं की फिल्में सफल हो रही हैं? के बारे में सोचने के लिए कुछ विचार तो बनता है कि नही..!!

https://youtu.be/Mgt9oWKoBaM?si=wZG0vTbQYY6olkMh

प्रेम चोपड़ा

प्रेम_चोपड़ा
🎂जन्म 23 सितम्बर 1935
हिंदी और पंजाबी फिल्मों के एक भारतीय अभिनेता हैं। उन्होंने 60 से अधिक वर्षों की अवधि में 380 फिल्मों में अभिनय किया है। ज्यादातर फिल्मों में खलनायक के अलावा उनकी बोली मृदुभाषी होती है। उनके नायक और राजेश खन्ना की मुख्य भूमिका वाली उनकी 19 फिल्में दर्शकों और आलोचकों के बीच लोकप्रिय बनी हुई हैं।
23 सितम्बर 1935 (उम्र 87)
लाहौर , पंजाब , ब्रिटिश भारत
(वर्तमान पंजाब , पाकिस्तान )
पेशा अभिनेता
सक्रिय वर्ष 1960–2021
जीवनसाथी
उमा मल्होत्रा

( एम. 1969 )
बच्चे 3
रिश्तेदार शरमन जोशी (दामाद)
विकास भल्ला (दामाद)
प्रेम नाथ (साला)
राजेंद्र नाथ (साला)
नरेंद्र नाथ (साला)
राज कपूर (चचेरा भाई )
पंजाबी हिंदू परिवार रणबीर लाल और रूपरानी चोपड़ा की छह संतानों में से तीसरे चोपड़ा का जन्म 23 सितंबर 1935 को लाहौर में हुआ था । भारत के विभाजन के बाद उनका परिवार शिमला चला गया , जहां उनका पालन-पोषण हुआ।उन्होंने एसडी सीनियर सेकेंडरी स्कूल, शिमला से पढ़ाई की है । उनके पिता की इच्छा थी कि वे एक डॉक्टर या भारतीय प्रशासनिक सेवा अधिकारी बनें।
चोपड़ा ने अपनी स्कूली शिक्षा और कॉलेज शिमला से पूरी की, जब उनके पिता, जो एक सरकारी कर्मचारी थे, का स्थानांतरण वहाँ हो गया। उन्होंने पंजाब विश्वविद्यालय से स्नातक की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने कॉलेज नाटकीयता में उत्साहपूर्वक भाग लिया। अपने पिता के आग्रह पर उन्होंने स्नातक की पढ़ाई पूरी की और फिर बॉम्बे (वर्तमान मुंबई) चले गये। उनकी पहली फिल्म बनाने के तुरंत बाद, उनकी मां को मुंह के कैंसर का पता चला और उनकी मृत्यु हो गई, जिससे उनकी नौ वर्षीय बहन अंजू की देखभाल उनके पिता और उनके चार अन्य भाइयों को करनी पड़ी। भाइयों ने अपनी-अपनी पत्नियों को चेतावनी दी थी कि अगर उनकी बहन खुश होगी तभी वे खुश होंगे और प्रेम अपनी बहन को अपनी पहली बेटी मानता है।मशहूर लेखक-निर्देशक लेख टंडन प्रेम के सामने उमा की शादी का प्रस्ताव लेकर आए। उमा भाई-बहन कृष्णा कपूर ( राज कपूर की पत्नी ), प्रेम नाथ और राजेंद्रनाथ की छोटी बहन थीं । दंपति की तीन बेटियां हैं, रकिता, पुनिता और प्रेरणा चोपड़ा। रकिता का विवाह फिल्म प्रचार डिजाइनर राहुल नंदा से हुआ है, जो लेखक और पटकथा लेखक गुलशन नंदा के बेटे हैं । पुनिता उपनगरीय मुंबई के बांद्रा में विंड चाइम्स नामक एक प्री-स्कूल की मालिक हैं और उन्होंने गायक और टेलीविजन अभिनेता विकास भल्ला से शादी की है । प्रेरणा ने बॉलीवुड एक्टर शरमन जोशी से शादी की है ।चोपड़ा मुंबई में पाली हिल , बांद्रा में एक डुप्लेक्स अपार्टमेंट में रहते हैं ।
1980 के दशक के अंत में उनका अपने चार भाइयों में से दो से अलगाव हो गया। चोपड़ा ने 1980 में दिल्ली में एक बंगला खरीदा था , जिसका स्वामित्व उनके और उनके पिता के पास संयुक्त रूप से था और उनके पिता और एक भाई वहां रहते थे। चोपड़ा ने अपने भाई को दिल्ली में नौकरी दिलवा दी थी और बंगले पर ही रहने दिया था। लेकिन उनकी मृत्यु से एक दिन पहले उनके पिता से उनके एक भाई के पक्ष में वसीयत पर हस्ताक्षर करवाया गया, जिससे बंगले पर चोपड़ा का अधिकार छीन लिया गया। बाद में उसी घर पर इनकम टैक्स का छापा पड़ा और छापे में उनके भाई ने कहा कि चोपड़ा ने उन्हें बंगला दिया था, लेकिन घर अभी भी प्रेम चोपड़ा के नाम पर है। चोपड़ा के पास बंबई में दो अन्य घर भी थे, जिन्हें उनके अन्य भाइयों ने उन्हें बताए बिना सस्ते में बेच दिया, क्योंकि उन्हें पैसे की जरूरत थी।
आजीविका
चोपड़ा का 50 साल का अच्छा करियर था और वह बॉलीवुड में खलनायक की भूमिकाओं के लिए लोकप्रिय थे।
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